February 11, 2026

श्रीराम के साथ-साथ भरत ने भी व्यतीत किया था संन्यास जीवन

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सोनारी गीता भवन में चल रहे नौ दिवसीय श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ का छठा दिन

जमशेदपुर : सोनारी कैलानगर स्थित गीता भवन में चल रहे नौ दिवसीय श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ में छठे दिन शुक्रवार को कथावाचक हरियाणा से आये आचार्य रविकांत वत्स ने श्रीराम-भरत संवाद का वर्णन भक्तों को सुनाए. उन्होंने कहा कि जिस भरत को संपूर्ण भारत का राज सिंहासन मिला, उसने अपने बड़े भाई श्रीराम के प्रेम में उसे ठुकरा कर उन्हें मनाने के लिए वन चले गए थे. आचार्य ने कहा कि अपनी मां कैकयी के वरदान से भले ही श्रीराम को वनवास मिला हो लेकिन इसकी सबसे ज्यादा पीड़ा भाई भरत को हुई. उन्हें आत्मग्लानि हुई कि बड़े भैया श्रीराम उनके बारे में क्या सोचेंगे. उन्होंने अपनी माता के इस कृत्य के लिए कभी माफ नहीं करने की बात कही.
साथ ही भैया राम व माता समान भाभी सीता को मनाने के लिए पूरे कुल, प्रजा, माताओं को साथ लेकर वन में चले गए. जब श्रीराम वापस अयोध्या नहीं लौटे तो भरत ने अपने भैया के चरण पादुका को सिंहासन पर रखकर शासन किया और नंदीग्राम में कुटिया बनाकर संन्यायी जीवन व्यतीत किया. आचार्य बताते हैं कि इससे पहले भगवान श्रीराम तमसा नदी के तट पर निषाद राज से मिले और उन्हें अपना मित्र बनाया. वहीं केवट की मदद से गंगा पार उतरे. इसके बाद मां गंगे की आरती की जिस पर उन्होंने माता सीता को अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद दिया था. आचार्य बताते हैं कि वनवास के दौरान भगवान ने ऋषि भारद्वाज, वाल्मिकी सहित उन सभी ऋषियों को दर्शन देकर परम धाम दिया जो कई वर्षों से तपस्या में लीन थे.