आदिवासी भाषा-साहित्य की सोंधी खुशबू के साथ साहित्य उत्सव शुरु
जिला-राज्य के साहित्यकार, लेखक, कलाकारों के साथ देश के अलग अलग प्रांतों से आये साहित्यकारों, लेखकों ने रखे अपने विचार
जमशेदपुर : प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव का शुभारंभ बिष्टुपुर गोपाल मैदान में देशभर के नामचीन, जनजातीय एवं स्थानीय साहित्यकारों की उपस्थिति में हुआ. तीन दिन तक चलनेवाले महोत्सव के पहले दिन झारखंड के जनजातीय साहित्यकारों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही. महादेव टोप्पो, डॉ पार्वती तिर्की डॉ अनुज लुगुन, रवींद्रनाथ मुर्मू, जोबा मुर्मू, डॉ नारायण उरांव, देवेंद्र नाथ चांपिया, जेरी पिंटो सहित कई साहित्यकारों ने पहले दिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
कार्यक्रम के शुरुआत में उप विकास आयुक्त नागेंद्र पासवान ने अतिथियों का स्वागत व विषय प्रवेश कराया. उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने इस आयोजन को लेकर कहा कि ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों, लेखकों एवं कलाकारों को सुनने, संवाद कर उनकी साहित्य, कला व संस्कृति को नजदीक से समझने का अवसर मिला. उम्मीद जताई कि यह उत्सव रचनात्मक संवाद और सांस्कृतिक समृद्धि का सशक्त मंच बनेगा.
इस दौरान छह अलग-अलग विषयों पर सत्रों का आयोजन हुआ. इसमें प्रथम सत्र झारखंड आदिवासी भाषा साहित्य की विश्व दृष्टि था. इसमें राष्ट्रीय साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित डा. पार्वती तिर्की और डॉ. अनुज लुगुन ने अपने विचार व्यक्त किये. इन कार्यक्रमों का संचालन एसडीओ धालभूम अर्नव मिश्रा, डीटीओ धनंजय, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी पंचानन उरांव, जिला शिक्षा अधीक्षक आशीष पांडेय व अन्य पदाधिकारियों का योगदान रहा.
द्वितीय सत्र का विषय आदिवासी इतिहास का अध्याय रहा. चौथे सत्र का विषय ओलचिकी लिपि का शताब्दी वर्ष रहा. इस पर चर्चा करने के लिए जोबा मुर्मू, रानी मुर्मू ,रविंद्र मुर्मू, वीर प्रताप मुर्मू मंचासीन हुए. पांचवें सत्र में कुडुख भाषा के संरक्षण और विकास में लगे तथा पेशे से चिकित्सक डॉ नारायण उरांव ने विचार व्यक्त किया. छठे सत्र में स्थानीय एवं देश भर में प्रतिष्ठित साहित्यकार जयनंदन के साथ अजय मेहताब ने वार्ता की. इसका विषय मजदूरों के शहर में साहित्य की पौध रहा.

