CAG Report Jharkhand : झारखंड में भवन निर्माण निगम की 102 करोड़ की योजनाएं अधूरी, किसानों को धान का भुगतान देने में दो साल तक की देरी
Ranchi/Jharkhand : झारखंड में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और किसानों से धान खरीद की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट में झारखंड राज्य भवन निर्माण निगम लिमिटेड के कामकाज में कई प्रकार की अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही का खुलासा हुआ है।रिपोर्ट के अनुसार निगम द्वारा शुरू की गई करीब 45 प्रतिशत योजनाएं अधूरी रह गईं, जबकि कई परियोजनाओं को जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण बीच में ही रद्द या बंद करना पड़ा। वहीं धान खरीद के मामले में भी सरकार निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकी और किसानों को भुगतान देने में दो साल तक की देरी सामने आई।
निगम की 102.87 करोड़ की 35 योजनाएं अधूरी
सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि भवन निर्माण निगम ने कई परियोजनाएं बिना पर्याप्त तैयारी और जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित किए ही शुरू कर दीं।ऑडिट में पाया गया कि जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण 112 निर्माण कार्यों को या तो रद्द कर दिया गया या बीच में ही बंद करना पड़ा। इससे करीब 102.87 करोड़ रुपये लागत की 35 योजनाएं अधूरी रह गईं। इसके अलावा निगम ने 24 निर्माण परियोजनाओं से जुड़े 60.95 करोड़ रुपये संबंधित विभागों को वापस करने के बजाय चार से सात वर्षों तक व्यक्तिगत लेजर खाते में ही रखे। ऑडिट के दौरान यह भी पाया गया कि निगम ने न तो कॉरपोरेट बजट तैयार किया और न ही परियोजनाओं के लिए विस्तृत डीपीआर (Detailed Project Report) तैयार की।
तकनीकी निगरानी समिति तक नहीं बनाई
रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम ने परियोजनाओं की निगरानी के लिए कोई तकनीकी समिति गठित नहीं की। कई परियोजनाएं वास्तविक स्थल और परिस्थितियों का आकलन किए बिना ही सलाहकारों द्वारा तैयार किए गए मॉडल अनुमान के आधार पर शुरू कर दी गईं।इसके कारण कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं और सरकारी धन का उपयोग भी प्रभावी ढंग से नहीं हो पाया।
2015 से 2023 के बीच 1328 योजनाएं शुरू, सिर्फ 55% पूरी
सीएजी ऑडिट में यह भी सामने आया कि वर्ष 2015 से 2023 के बीच निगम ने 1328 निर्माण योजनाएं शुरू कीं, जिनकी कुल अनुमानित लागत 14,020.46 करोड़ रुपये थी। हालांकि इनमें से केवल 725 योजनाएं (करीब 55 प्रतिशत) ही पूरी हो सकीं। इन पूर्ण परियोजनाओं की लागत 4291.07 करोड़ रुपये बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार 272 योजनाएं प्रारंभिक चरण में थीं, जबकि 218 परियोजनाओं पर कार्य प्रगति पर था।
डिग्री कॉलेज और विद्यालय परियोजनाओं में भी गड़बड़ी
रिपोर्ट में कई परियोजनाओं में अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया है। हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइन के प्रभावों का आकलन किए बिना 12 करोड़ रुपये की लागत से बने डिग्री कॉलेज का उपयोग नहीं हो पा रहा है। डांडा और बिशुनपुरा में बालिका आवासीय विद्यालय का आंशिक निर्माण होने के कारण 5.60 करोड़ रुपये का खर्च व्यर्थ हो गया। संगमा में ठेकेदार द्वारा काम बीच में छोड़ देने से 2.80 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। रिपोर्ट में पारदर्शिता की कमी, अनुबंध करने में देरी, अनियमित भुगतान और पूरक समझौतों में गड़बड़ी जैसी कई खामियों की ओर भी इशारा किया गया है।
किसानों से धान खरीद लक्ष्य भी पूरा नहीं
सीएजी रिपोर्ट में राज्य में धान खरीद व्यवस्था की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 से 2022 के बीच सरकार ने 18.29 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन इसके मुकाबले केवल 16.47 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद ही हो सकी। ऑडिट में पाया गया कि इस अवधि में 1.59 लाख किसानों से धान खरीदा गया, लेकिन अधिकांश किसानों को भुगतान देने में भारी देरी हुई।
किसानों को भुगतान में 775 दिन तक की देरी
नियम के अनुसार किसानों को धान की कीमत दो किस्तों में समय पर दी जानी चाहिए थी, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक 79 से 98 प्रतिशत किसानों को भुगतान करने में दो साल से अधिक यानी 775 दिन तक की देरी हुई। यहां तक कि निर्धारित समय सीमा के चार साल बाद भी 1741 किसानों को 8.64 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया गया।
33 मिलरों से 71.81 करोड़ की वसूली नहीं
ऑडिट में यह भी सामने आया कि वर्ष 2018-22 के दौरान 33 राइस मिलरों ने मिलिंग के लिए उठाए गए धान के बदले भारतीय खाद्य निगम (FCI) में चावल जमा नहीं किया। इन मिलरों द्वारा जमा नहीं किए गए चावल की कीमत करीब 71.81 करोड़ रुपये आंकी गई है। इसके बावजूद सरकार की ओर से इन मिलरों या संबंधित लैम्पस-पैक्स के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
बिजली निगम में भी अतिरिक्त खर्च
रिपोर्ट में झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। बताया गया कि निगम ने मौजूदा सप्लायरों से ऑर्डर देने के बजाय नया टेंडर जारी किया, जिससे उपकरणों की खरीद ऊंची कीमत पर करनी पड़ी और करीब 5.93 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च हुआ। इसके अलावा डीटीआर मीटर में मॉडम ट्रांसमिशन उपकरण नहीं लगाने के कारण 4.31 करोड़ रुपये का खर्च व्यर्थ चला गया। वहीं सिकिदरी हाईडल प्रोजेक्ट में मरम्मत कार्य समय पर नहीं होने से करीब 8.46 करोड़ रुपये मूल्य के बिजली उत्पादन का नुकसान हुआ।
