March 24, 2026

Jharkhand High Court News : अधिवक्ता की विधवा को पेंशन देने में देरी पर ‘वेलफेयर कमेटी’ को नोटिस, मांगा जवाब

Jharkhand High Court News

अधिवक्ता की विधवा को पेंशन देने में देरी पर 'वेलफेयर कमेटी' को नोटिस, मांगा जवाब

Ranchi/Jharkhand : झारखंड उच्च न्यायालय ने एक दिवंगत अधिवक्ता की विधवा द्वारा दायर पारिवारिक पेंशन याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने झारखंड एडवोकेट्स वेलफेयर पेंशन कमेटी और ट्रस्टी कमेटी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उन्हें औपचारिक नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति आनंदा सेन की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों कमेटियों को तीन सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है।

दो वर्षों की देरी पर कोर्ट नाराज

यह मामला झारखंड एडवोकेट्स वेलफेयर (पेंशन एवं फैमिली पेंशन) नियम, 2012 के तहत दायर किया गया है। याचिकाकर्ता विधवा जाकिया खातून ने अदालत को बताया कि उनके पति की मृत्यु के बाद भी पिछले दो वर्षों से उन्हें पारिवारिक पेंशन के लिए भटकना पड़ रहा है। सुनवाई के दौरान झारखंड स्टेट बार काउंसिल ने भी याचिकाकर्ता के दावे का समर्थन किया और स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें नियमानुसार पेंशन प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है।

क्या है मामला?

याचिकाकर्ता के पति धनबाद न्यायालय क्षेत्र में एक सक्रिय अधिवक्ता थे और धनबाद बार एसोसिएशन के सम्मानित सदस्य थे। उन्होंने अगस्त 2022 में 10,000 रुपये की एकमुश्त राशि जमा कर पेंशन फंड की सदस्यता ली थी। नवंबर 2023 में उनके देहांत के बाद, उनकी पत्नी ने नियम 15(4) के तहत निर्धारित ‘फार्म-डी’ में सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन किया था। आवेदन के महीनों बीत जाने के बाद भी विभाग द्वारा पेंशन की राशि स्वीकृत नहीं की गई, जिससे परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है।

अनुच्छेद 21 का उल्लंघन और 12% ब्याज की मांग

याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता मोहम्मद शादाब अंसारी ने दलील दी कि पेंशन में इतनी लंबी देरी संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। नियम 14(3) के तहत मृत अधिवक्ता की पत्नी को पारिवारिक पेंशन का कानूनी अधिकार प्राप्त है। याचिका में न केवल बकाया पेंशन के भुगतान की मांग की गई है, बल्कि देरी के लिए 12 प्रतिशत ब्याज देने का भी आग्रह किया गया है। उच्च न्यायालय अब इस मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह की नोटिस अवधि पूरी होने के बाद करेगा। कानूनी गलियारों में इस मामले को अधिवक्ताओं के कल्याणार्थ बनी संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।