February 10, 2026

मायानगरी के आसमान में चमका लौहनगरी का सितारा

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परसुडीह के विश्वदीप ‘ज़ीस्त’ ने संगीतकार ए आर रहमान के लिए साइलेंट फिल्म “गांधी टॉक्स” में लिखा गीत

जमशेदपुर : शहर के विश्वदीप ‘ज़ीस्त’ को फिल्म में ऑस्कर विजेता संगीतकार ए आर रहमान के लिए गीत लिखने का मौका मिला है. फिल्म में विश्वदीप द्वारा लिखी गई “निंदिया परी” समेत कुल तीन गीत शामिल है. परसुडीह के गलियों में पले-बढ़े विश्वदीप ने करीम सिटी कॉलेज से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर अपने सपनों को पूरा करने 2013 में मायानगरी का रुख कर लिया था. बिना किसी गॉडफादर और बड़े संपर्क के विश्वदीप ‘ज़ीस्त’ ने एक दशक से ज्यादा समय तक मुंबई में लगातार संघर्ष किया. इस दौरान उन्होंने ख़ामोशी, वो भी दिन थे, दंगे और गांधी टॉक्स आदि फिल्मों में गीत लिखे और अब तक उनके लिखे 20 से ज्यादा फिल्मी और गैर फिल्मी गीत रिलीज हो चुके हैं. विश्वदीप बताते है कि ए. आर. रहमान के लिए काम करना, ऐसे सपने का सच होने जैसा है, जो उन्होंने देखने की भी हिम्मत नहीं की थी.
‘गांधी टॉक्स’ में शामिल ‘निंदिया परी’ एक लोरी है, जिसे एक पिता अपनी बेटी के लिए गाते है, जिसे ए आर रहमान ने पसंद किया और उसे फिल्म का हिस्सा बनाया. म्यूजिक लॉन्च के दौरान श्री रहमान से मिली शाबाशी ने उनके वर्षों के संघर्ष को सार्थक बना दिया है.
बहुचर्चित फिल्म ‘गांधी टॉक्स’ में शामिल ‘निंदिया परी’ गीत जमशेदपुर के विश्वदीप ‘ज़ीस्त’ की अब तक की सबसे बड़े उपलब्धि है. गीतकार के रूप में उनके फ़िल्मी सफर की शुरुआत साजिद अली की फिल्म ‘वो भी दिन थे’ से हुई, जिसमें उन्होंने जॉय बरुआ के संगीत निर्देशन में ‘मुझको मिली’ नामक गीत लिखा. इसके बाद उन्होंने समीर टंडन के साथ फिल्म ‘खामोशी’ के लिए शीर्षक गीत लिखा, जिसे श्रुति हासन ने अपनी आवाज दी थी. आगे चलकर उन्होंने बिजॉय नाम्बियार निर्देशित फ़िल्म ‘दंगे’ का गीत ‘ये पल हैं अपने’ भी लिखा. उनके लिखे गीतों को हरिहरन, अलका याग्निक, मोहित चौहान, पापोन, मोनाली ठाकुर, नीति मोहन, जोनिता गांधी, कुणाल गांजावाला, श्रुति हासन आदि दिग्गज गायकों ने भी अपनी आवाज़ दी है. फिल्मों के साथ साथ विश्वदीप ज़ीस्त’ साहित्य की दुनिया में भी काफी सक्रिय हैं और मुम्बई, नवी मुम्बई, पुणे, सूरत, जमशेदपुर आदि शहरों के ढेरों कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा ले चुके हैं.

● बचपन की एक घटना से लेखन को मिली प्रेरणा

अपनी सफलता के बारे में बताते हुए विश्वदीप भावुक हो जाते है और कहते है कि 2013 को जब वो गीतकार बनने का सपना लिए मुम्बई आने की योजना बना रहे थे, तब कई लोगों ने उन्हें हतोत्साहित किया, हौसला तोड़ा, लेकिन उन्हें अपनी प्रतिभा पर पूरा भरोसा था और इसी प्रतिभा और दृढ़ निश्चय के दम पर उन्होंने बॉलीवुड में अपने झंडे गाड़े.
बचपन में एक दिन जब उन्हें पता चला कि स्वर कोकिला लता मंगेशकर द्वारा गाया गया एक बंगला गीत उनके पिता मनोज कांति सेन द्वारा लिखा गया है, जिसका क्रेडिट उन्हें कभी नहीं मिला, तो इस घटना ने भी उन्हें लेखन में आने को प्रेरित किया. लगभग 13 साल की उम्र में उन्होंने शायरी करनी शुरू कर दी, और वो सिलसिला निरंतर जारी रहा.