AI की भूख बुझाने आया नया खिलाड़ी! 27 मिलियन डॉलर जुटाकर बनाया ऐसा सिस्टम, जो बिना बिजली ग्रिड के चलाएगा डेटा सेंटर
नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ जितनी तेज हो रही है, उतनी ही तेजी से बढ़ रही है बिजली की मांग। दुनिया भर में डेटा सेंटरों का विस्तार हो रहा है, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अब चिप्स या तकनीक नहीं, बल्कि बिजली बन गई है। इसी बीच एक स्टार्टअप ने ऐसा दावा किया है जिसने टेक इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
आज दुनिया के कई हिस्सों में डेटा सेंटरों को लेकर विवाद बढ़ रहे हैं। कहीं वे भारी मात्रा में बिजली खा रहे हैं, तो कहीं स्थानीय लोगों को शोर और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में तो लोगों को आशंका है कि AI की बढ़ती मांग आम नागरिकों की बिजली आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है।
यहीं TAR का मॉडल अलग नजर आता है। कंपनी सोलर एनर्जी, पवन ऊर्जा, बैटरियों और जरूरत पड़ने पर गैस टर्बाइन के मिश्रण से 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन सिस्टम्स को फैक्ट्री में पहले से तैयार कर साइट पर तेजी से लगाया जा सकेगा, जिससे डेटा सेंटर शुरू करने का समय काफी कम हो जाएगा।
कंपनी का दावा है कि उसका पहला पायलट प्रोजेक्ट लगातार 10 मेगावाट बिजली उपलब्ध कराएगा, जबकि पहला व्यावसायिक प्रोजेक्ट इससे भी दोगुनी क्षमता का होगा। TAR का कहना है कि वह 2027 तक 200 मेगावाट से अधिक और 2028 तक कई गीगावाट क्षमता के सिस्टम तैनात करने की योजना बना रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI उद्योग की सबसे बड़ी लड़ाई चिप्स या सॉफ्टवेयर की नहीं, बल्कि ऊर्जा की होगी। जिस कंपनी के पास सस्ती, तेज और भरोसेमंद बिजली होगी, वही AI की रेस में आगे निकल सकती है।
अगर TAR का मॉडल सफल होता है, तो यह सिर्फ डेटा सेंटर उद्योग को नहीं बदलेगा, बल्कि AI के भविष्य को भी नई दिशा दे सकता है। ऐसे समय में जब दुनिया AI के विस्तार और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच संतुलन खोज रही है, यह तकनीक एक संभावित समाधान के रूप में उभर रही है।
