June 16, 2026

ED की पूछताछ के बीच आया स्पीकर का बुलावा! अभिषेक बनर्जी को 2 घंटे में दिल्ली पहुंचने का संदेश, TMC में मची हलचल

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बंगाल की राजनीति में नया ट्विस्ट: ED दफ्तर में थे अभिषेक, तभी आया लोकसभा स्पीकर का संदेश

कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त नया मोड़ आ गया जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की पूछताछ का सामना कर रहे थे और इसी दौरान लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के कार्यालय से उन्हें तत्काल मुलाकात का संदेश भेजा गया।

सूत्रों के अनुसार, सोमवार दोपहर करीब 2 बजे अभिषेक बनर्जी को ईमेल मिला, जिसमें शाम 4 बजे स्पीकर से मिलने के लिए कहा गया था। यानी केवल दो घंटे के भीतर दिल्ली में मौजूद होने का संदेश। लेकिन उस समय अभिषेक कोलकाता स्थित ED कार्यालय में घंटों से पूछताछ का सामना कर रहे थे।

आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों?

यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि उसी समय TMC के भीतर सबसे बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो चुका था। पार्टी के करीब 20 सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंकते हुए अलग गुट बनाने और खुद को “असली TMC” बताने की तैयारी शुरू कर दी थी।

बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से मुलाकात कर अलग बैठने की व्यवस्था और नई राजनीतिक पहचान की मांग भी रख दी थी। इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी को मुश्किल में डाल दिया है।

ED पूछताछ और राजनीतिक संकट साथ-साथ

एक ओर अभिषेक बनर्जी कथित शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े मामले में ED के सवालों का सामना कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर टूट की खबरें लगातार तेज होती जा रही थीं।

TMC नेताओं का कहना है कि अभिषेक जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग कर रहे थे और देर रात तक पूछताछ चली। ऐसे में स्पीकर कार्यालय से आया तत्काल बुलावा कई नए सवाल खड़े कर रहा है।

क्या TMC का बागी गुट पाएगा मान्यता?

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला अब बागी सांसदों और ममता बनर्जी खेमे दोनों की दलीलें सुनेंगे। इसके बाद कानूनी राय लेकर फैसला किया जाएगा कि अलग हुए सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता दी जाए या नहीं।

संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सांसदों के अलग होने से किसी दल का विलय नहीं माना जा सकता। राजनीतिक दल का आधिकारिक फैसला और संवैधानिक प्रक्रिया दोनों जरूरी हैं।

बंगाल की सियासत में बढ़ी बेचैनी

TMC के लिए यह सिर्फ संसदीय संकट नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की चुनौती भी बनता जा रहा है। अगर बागी सांसदों को मान्यता मिलती है तो संसद में पार्टी की ताकत और राजनीतिक संदेश दोनों पर असर पड़ सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह केवल बगावत है या बंगाल की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत?

आने वाले दिनों में लोकसभा स्पीकर का फैसला, बागी सांसदों की रणनीति और अभिषेक बनर्जी पर चल रही जांच, तीनों मिलकर राष्ट्रीय राजनीति का नया अध्याय लिख सकते हैं।

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