चुनावी व्यंग्य : जमशेदपुर में ‘मेयर’ की महिमा और ‘पत्नियों’ का पराक्रम | Jamshedpur Municipal Election 2026
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- जब टिकट एक हो और दावेदार दो, तो समझो माहौल गरम है!
- मानगो का ‘मेयर’ पद या राजनैतिक ‘महाभारत’?
Jamshedpur में इन दिनों बसंत की बयार भले ही देर से आए, लेकिन चुनावी सरगर्मी ने पारा अभी से 45 डिग्री के पार पहुँचा दिया है। मानगो नगर निगम के मेयर पद की सीट क्या ‘आरक्षित’ हुई, मानों स्थानीय राजनेताओं के घरों में ‘नारी शक्ति’ का अचानक उदय हो गया। हालत यह है कि मेयर पद के लिए 13 देवियां मैदान में हैं, और हर कोई खुद को मानगो की ‘भाग्य विधाता’ बता रहा है।
सबसे दिलचस्प नजारा तो उन पार्टियों का है जहाँ “एक फूल, दो माली” वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। भाजपा में तो आलम यह है कि घर के झगड़े सड़क पर आ गए हैं। एक तरफ पूर्व जिला अध्यक्ष राजकुमार श्रीवास्तव की धर्मपत्नी कुमकुम श्रीवास्तव ताल ठोक रही हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी के ही नीरज सिंह की अर्धांगिनी संध्या सिंह एनडीए का झंडा बुलंद कर रही हैं। पार्टी के कार्यकर्ताओं की हालत उस बच्चे जैसी है जिसके सामने दो अलग-अलग स्वाद की चॉकलेट रख दी गई हों—खाए तो कौन सी?
पतियों का पावर और ‘मैडम’ का मैनिफेस्टो
मानगो के इस दंगल में असली कुश्ती तो परदे के पीछे उन ‘माननीयों’ की हो रही है जो खुद तो चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन अपनी पत्नियों के कंधे पर बंदूक रखकर ‘सत्ता’ का शिकार करना चाहते हैं।
सुधा गुप्ता (कांग्रेस) : पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी हैं, जिन्हें कांग्रेस का ‘पूर्ण आशीर्वाद’ प्राप्त है। अब मंत्री जी का रसूख काम आएगा या सुधा जी की अपनी मुस्कान, यह तो वोटिंग मशीन ही बताएगी।
जेबा खान (कांग्रेस) : इधर बन्ना गुट सक्रिय है, तो उधर फिरोज खान की पत्नी जेबा खान ने भी मैदान नहीं छोड़ा है। यानी कांग्रेस के अंदर भी ‘मजा’ पूरा है।
व्यंग्य का बाण : “पार्टी एक, परिवार अनेक” के चक्कर में बेचारे आम मतदाता का सर चकरा रहा है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह ‘हाथ’ से बैलेट पर मुहर मारे या ‘हाथ’ जोड़कर घर बैठ जाए!
जुगसलाई : नौ देवियां और एक कुर्सी
इधर मानगो में 13 का आंकड़ा है, तो जुगसलाई नगर परिषद में भी 9 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रही हैं। यहां भी कहानी वही है—चेहरा पत्नी का, पावर पति का। जुगसलाई की संकरी गलियों में इन दिनों विकास की गंगा कम, वादों का कीचड़ ज्यादा बह रहा है।
वार्ड पार्षदों की तो बाढ़ ऐसी आई है कि जैसे मानगो और जुगसलाई के हर दूसरे घर में एक ‘भावी पार्षद’ निवास कर रहा है। सड़क पर निकलिए तो डर लगता है कि कहीं किसी प्रत्याशी के पोस्टर से टकराकर चोट न लग जाए।
जनता जनार्दन या केवल ‘वोट बैंक’?
इन सब ‘माननीयों’ की पत्नियों के बीच असली चुनाव तो इस बात का है कि किसका ‘पॉलिटिकल हस्बैंड’ कितना दमदार है। पार्टियों ने तो अपना-अपना पाला चुन लिया है—कांग्रेस सुधा गुप्ता के साथ खड़ी है, तो भाजपा (NDA) ने संध्या सिंह को अपना ‘सारथी’ बना लिया है। लेकिन बागी उम्मीदवारों ने जो रायता फैलाया है, उसे समेटने में राष्ट्रीय अध्यक्षों के भी पसीने छूट रहे हैं।
अब देखना यह है कि मानगो और जुगसलाई की जनता इन ‘शक्तिशाली पत्नियों’ में से किसे चुनती है, या फिर यह चुनाव सिर्फ पतियों के ‘अहंकार’ की लड़ाई बनकर रह जाता है।

