March 7, 2026

Bhagalpur Silk Industry Crisis : ‘सिल्क सिटी’ भागलपुर की चमक पड़ी फीकी, 25 करोड़ का ऑर्डर रद्द, जानें वजह

Bhagalpur Silk Industry Crisis News

Bhagalpur Silk Industry Crisis (Symbolic Photo)

Bhagalpur/Bihar : सात समंदर पार चल रहे अमेरिका और ईरान के बीच के युद्ध (War between America and Iran) की तपिश अब बिहार के रेशमी धागों को झुलसाने लगी है। विश्व प्रसिद्ध ‘सिल्क सिटी’ भागलपुर के बुनकर आज एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय संकट के मुहाने पर खड़े हैं, जहां उनके करघों की खट-खट थमने लगी है। वैश्विक तनाव का सीधा असर यहां के निर्यात पर पड़ा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगा है।

बुनकरों के अरमानों पर फिरा पानी

भागलपुर के सिल्क की केवल भारत के महानगरों, बल्कि अमेरिका और खाड़ी देशों के बाजारों में भी भारी मांग रहती है। लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के कारण सिल्क का व्यापार बुरी तरह लड़खड़ा गया है। स्थानीय बुनकरों के अनुसार, हाल ही में करीब 25 करोड़ रुपये का एक बड़ा एक्सपोर्ट ऑर्डर अचानक रद्द कर दिया गया। इस वजह से बुनकर बहुल इलाकों का नजारा बेहद चिंताजनक है। कई गलियों में लूम (करघे) बंद पड़े हैं और वहां सन्नाटा पसरा हुआ है।

बुनकरों की व्यथा : एक संकट खत्म नहीं होता कि दूसरा खड़ा हो जाता है

स्थानीय बुनकर हेमंत कुमार और आलोक कुमार ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि यह उद्योग पिछले कुछ वर्षों से लगातार चुनौतियों का सामना कर रहा है।

  • कोरोना की मार: पहले कोविड-19 ने कमर तोड़ी, जिससे बाजार लंबे समय तक बंद रहे।
  • बांग्लादेश संकट: भागलपुर का तैयार माल बड़े पैमाने पर बांग्लादेश जाता था, लेकिन वहां की राजनीतिक अस्थिरता ने उस बाजार के दरवाजे लगभग बंद कर दिए।
  • अमेरिकी नीतियां और टैरिफ: अमेरिका की बदलती व्यापारिक नीतियों और नए टैरिफ ने भी निर्यात को महंगा और कठिन बना दिया है।

बुनकरों का कहना है कि जब वे कोरोना और बांग्लादेश संकट से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे, तब अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने रही-सही कसर पूरी कर दी।

विविधता और अस्तित्व पर मंडराता खतरा

भागलपुर अपनी रेशमी विविधता के लिए जाना जाता है। यहां तसर (Tussar), मुगा (Muga), कोटा (Kota), मटका (Matka), मलवरी (Mulberry) और अरंडी (Eri) जैसे बेहतरीन सिल्क के कपड़े तैयार किए जाते हैं। हेमंत कुमार बताते हैं कि कभी भागलपुर के सिल्क की धूम पूरी दुनिया में थी, लेकिन आज हालात ये हैं कि कई कुशल बुनकर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। अगर स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो कई परिवारों को अपने पुश्तैनी लूम बेचकर गुजारा करना होगा। यह केवल एक आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लुप्त होने का संकेत भी है।

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