June 16, 2026

30 वर्षों की सेवा, सम्मान और समर्पण की मिसाल: लायंस क्लब की सीमा बाजपेयी ने बदल दीं सैकड़ों ज़िंदगियाँ

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जमशेदपुर: समाज सेवा केवल दान या मदद का नाम नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक सतत प्रयास है। इसी सोच को पिछले 30 वर्षों से अपने जीवन का उद्देश्य बनाकर चल रही हैं सीमा बाजपेयी, जो लायंस क्लब से जुड़कर समाज के विभिन्न वर्गों के लिए लगातार कार्य कर रही हैं। हाल ही में सर्च न्यूज़ को दिए गए विशेष साक्षात्कार में उन्होंने अपने सामाजिक जीवन के अनुभव, संघर्ष, प्रेरणाएं और उपलब्धियों को साझा किया।

सीमा बाजपेयी बताती हैं कि समाज सेवा की भावना उनके भीतर बचपन से ही थी। स्कूल के दिनों में भी वह सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहती थीं और कोलकाता में छात्र परिषद से भी जुड़ी हुई थीं। उनका हमेशा से मन था कि वह समाज और जरूरतमंद लोगों के लिए कुछ करें।

विवाह के बाद जब वह जमशेदपुर आईं, तब उनके जीवन को एक नई दिशा मिली। ए.के. श्रीवास्तव उस समय लायंस क्लब के गवर्नर थे और उन्होंने लायंस क्लब ऑफ आदित्यपुर के अंतर्गत एक यूथ क्लब की स्थापना की थी। इसी यूथ क्लब के माध्यम से सीमा बाजपेयी और उनके पति संतोष बाजपेयी सामाजिक गतिविधियों से जुड़े। समाज सेवा के प्रति उनकी रुचि और सक्रियता को देखते हुए बाद में उन्होंने वर्ष 1996 में लायंस क्लब की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की, जिसके बाद से वे लगातार संगठन के विभिन्न सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाती आ रही हैं।

संयुक्त परिवार, बच्चों की परवरिश और समाज सेवा—सब कुछ साथ लेकर चलीं

सीमा बाजपेयी बताती हैं कि उनका परिवार संयुक्त था। घर और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए समाज सेवा करना आसान नहीं था। वह पहले घर का काम पूरा करती थीं, परिवार के लिए खाना बनाती थीं, टिफिन तैयार करती थीं और उसके बाद मीटिंग या सामाजिक कार्यक्रमों में जाती थीं। कार्यक्रम समाप्त होते ही तुरंत वापस घर लौट आती थीं।

उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे उनके कार्यों की चर्चा समाचार पत्रों में प्रकाशित होने लगी, जिससे उनके ससुराल पक्ष को भी गर्व महसूस होने लगा। उनके दिवंगत पति संतोष बाजपेयी, जो एक व्यवसायी थे, ने हमेशा उनका पूरा समर्थन किया। उन्होंने ही सीमा जी को आगे बढ़ने, प्रशिक्षण लेने और नेतृत्व की जिम्मेदारियां संभालने के लिए प्रेरित किया।

अपने बच्चों की शिक्षा और करियर के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने दोनों बेटों की पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान दिया। उनका बड़ा बेटा XLRI से एमबीए करने के बाद व्यवसाय से जुड़ा हुआ है, जबकि छोटा बेटा मणिपाल विश्वविद्यालय से प्रिंटिंग एंड मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई कर चुका है। वह पहले दुबई की एमिरेट्स कंपनी में कार्यरत था और वर्तमान में वर्क फ्रॉम होम कर रहा है।

महिलाओं के लिए समाज सेवा आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं

महिलाओं के लिए समाज सेवा के क्षेत्र में आने की चुनौतियों पर सीमा बाजपेयी ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र कई बार कठिन भी है और कई बार सरल भी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं को अपनी गरिमा और व्यक्तित्व की मजबूती बनाए रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “मैं 30 वर्षों से समाज सेवा में हूं। मैंने हमेशा अपनी गरिमा और सम्मान को प्राथमिकता दी, इसलिए हर जगह मुझे सम्मान मिला। समाज में कई लोग महिलाओं को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते, लेकिन यदि 10 लोग आपको पीछे खींचते हैं तो 20 लोग ऐसे भी होते हैं जो आपको आगे बढ़ाने के लिए तैयार रहते हैं।”

सीमा जी ने अपने दिवंगत पति संतोष बाजपेयी को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा बताया। उन्होंने कहा कि उनके पति ने ही उन्हें प्रशिक्षणों में भेजा और नेतृत्व के लिए तैयार किया।

एक नाव ने बदल दी सैकड़ों बच्चों की जिंदगी

समाज सेवा के दौरान कई ऐसे कार्य हुए जिन्हें सीमा बाजपेयी आज भी अपने दिल के करीब मानती हैं। उन्होंने बताया कि एक महिला नारियल के लड्डू बनाती थीं, लेकिन उनकी पहचान सीमित थी। लायंस क्लब ने “वोकल फॉर लोकल” की भावना के तहत उनके उत्पाद का प्रचार-प्रसार किया, जिससे उनकी अलग पहचान बन गई और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आया।

उन्होंने एक और भावुक घटना का जिक्र किया। एक दिन द टेलीग्राफ में खबर प्रकाशित हुई कि बिहार के सासाराम के पास एक गांव के बच्चों को स्कूल जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। यह खबर पढ़कर लायंस क्लब के सदस्यों ने स्वयं आर्थिक योगदान दिया और उन बच्चों के लिए एक नाव खरीदकर उपलब्ध कराई। इस पहल से लगभग 50 से 100 विद्यार्थियों को सुरक्षित रूप से स्कूल आने-जाने में मदद मिली और उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया।

कोरोना काल से लेकर अस्पतालों तक, हर मोर्चे पर रहा लायंस क्लब

सीमा बाजपेयी ने बताया कि लायंस क्लब का नेटवर्क और संपर्क व्यवस्था बेहद मजबूत है। संगठन जरूरतमंदों के अस्पताल के बिल चुकाने में सहायता करता है, रक्तदान की व्यवस्था करवाता है और किन्नर समाज की मदद के लिए भी सक्रिय रहता है।

कोरोना महामारी के दौरान लायंस क्लब ने उल्लेखनीय कार्य किए। जमशेदपुर से लेकर असम तक मरीजों के लिए अस्पताल में बेड उपलब्ध कराने में मदद की गई। संगठन ने आठ ऑक्सीजन बैंक स्थापित किए और जरूरतमंदों के बीच निःशुल्क भोजन का वितरण भी किया।

इसी दौरान पुलिसकर्मियों और पेट्रोल पंप कर्मचारियों की सेवा में भी संगठन आगे आया। उन्हें चाय, बिस्कुट और भुजिया वितरित कर उनका उत्साहवर्धन किया गया।

ऑस्ट्रेलिया में शपथ, शिकागो में प्रशिक्षण

सीमा बाजपेयी के सामाजिक जीवन की उपलब्धियों में अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि उनकी शपथ ग्रहण समारोह ऑस्ट्रेलिया में आयोजित हुई थी, जबकि नेतृत्व संबंधी प्रशिक्षण उन्हें अमेरिका के शिकागो में प्राप्त हुआ।

महिलाओं को दिया सफलता का मंत्र

जो महिलाएं समाज सेवा के क्षेत्र में आना चाहती हैं, उनके लिए सीमा बाजपेयी का संदेश बेहद स्पष्ट है। उनका कहना है कि यदि महिलाएं अपनी गरिमा और सम्मान को बनाए रखते हुए कार्य करें और परिवार को साथ लेकर चलें, तो उनके लिए कोई भी मंजिल दूर नहीं है।

उन्होंने कहा, “यदि आप अपनी डिग्निटी बनाए रखेंगे तो कोई भी आपके बारे में गलत बात नहीं कर सकेगा। समाज सेवा में व्यक्तिगत प्रचार से अधिक महत्वपूर्ण है लोगों के साथ मिलकर काम करना। परिवार और समाज दोनों को साथ लेकर चलेंगे तो सफलता निश्चित है।”

सीमा बाजपेयी की कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, परिवार का सहयोग मिले और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा हो, तो एक व्यक्ति हजारों लोगों के जीवन में उम्मीद की रोशनी बन सकता है।

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