June 1, 2026

84 घंटे काम, फिर भी संघर्ष जारी… ऐप की दुनिया में पिस रहे हैं डिलीवरी बॉय!

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नई दिल्ली: “जितना ज्यादा काम करोगे, उतना कमाओगे…” — ऑनलाइन डिलीवरी कंपनियों का यह वादा अब हजारों गिग वर्कर्स के लिए थकान, तनाव और असुरक्षा की कहानी बनता जा रहा है। तेजी से बढ़ती प्लेटफॉर्म इकॉनमी में काम करने वाले डिलीवरी एजेंट्स आज समय की रेस में ऐसे फंस चुके हैं, जहां मेहनत तो बढ़ रही है, लेकिन स्थिर जिंदगी अब भी दूर है।

हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली समेत कई शहरों में फूड और ग्रोसरी डिलीवरी करने वाले कर्मचारी हफ्ते में 80 से 84 घंटे तक काम कर रहे हैं। वजह है ऐप्स का “इंसेंटिव लॉक” सिस्टम। यानी एक तय टारगेट पूरा किए बिना उन्हें बेहतर कमाई नहीं मिलती।

दिल्ली के कई डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि दिन-रात मेहनत के बाद भी उनकी कमाई 25 से 30 हजार रुपये महीने के बीच ही रहती है। इसी पैसे से उन्हें पेट्रोल, बाइक की EMI, घर का किराया और परिवार का खर्च उठाना पड़ता है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि ऐप्स के एल्गोरिद्म और लगातार बदलते इंसेंटिव सिस्टम ने काम को और मुश्किल बना दिया है। कई वर्कर्स को समझ ही नहीं आता कि अचानक इंसेंटिव क्यों घट गया या पेनल्टी कैसे लग गई। तकनीक के जरिए होने वाली यह निगरानी अब मानसिक दबाव में भी बदलती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि गिग इकॉनमी ने युवाओं को रोजगार तो दिया है, लेकिन इसके साथ अस्थिरता और असुरक्षा भी बढ़ी है। फिल्मों और सोशल मीडिया में दिखने वाली “फास्ट लाइफ” के पीछे इन डिलीवरी एजेंट्स की असली जिंदगी अक्सर नजर नहीं आती।

सरकार की ओर से गिग वर्कर्स के लिए कुछ नए श्रम सुधार और सुरक्षा योजनाओं की बातें जरूर हो रही हैं, लेकिन ज्यादातर कर्मचारियों को अभी तक इनके बारे में जानकारी ही नहीं है।

तेजी से डिजिटल होती दुनिया में अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या तकनीक और मुनाफे की इस दौड़ में मेहनतकश लोगों की जिंदगी और सम्मान सुरक्षित रह पाएगा?