अब कचरा नहीं, बनेगा खजाना! जमशेदपुर के वैज्ञानिकों ने खोजा लिथियम बैटरियों से करोड़ों की धातुएं निकालने का तरीका
EV क्रांति के बीच CSIR-NML और R2E Greentech की बड़ी साझेदारी, बैटरी वेस्ट से निकलेगा लिथियम, कोबाल्ट और अन्य बहुमूल्य धातुएं
इसी तकनीक को उद्योग स्तर तक पहुंचाने के लिए CSIR-NML ने नई दिल्ली की कंपनी R2E Greentech Pvt. Ltd. के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता (MoU) किया है। विशेषज्ञ इसे भारत के बैटरी रीसाइक्लिंग सेक्टर में एक बड़ा बदलाव मान रहे हैं।
क्यों है यह तकनीक इतनी महत्वपूर्ण?
आज इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही पुरानी बैटरियों का ढेर भी बढ़ता जा रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन बैटरियों में मौजूद रसायन मिट्टी और पानी को गंभीर रूप से प्रदूषित कर सकते हैं और आग लगने जैसी घटनाओं का खतरा भी पैदा कर सकते हैं।
ऐसे में यह नई तकनीक न सिर्फ पर्यावरण को बचाने में मदद करेगी, बल्कि उन बहुमूल्य धातुओं को भी दोबारा उपयोग में ला सकेगी जिन्हें भारत अभी बड़ी मात्रा में विदेशों से आयात करता है।
भारत के लिए क्यों है गेम चेंजर?
लिथियम और कोबाल्ट जैसी धातुएं इलेक्ट्रिक वाहनों और आधुनिक ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की रीढ़ मानी जाती हैं। भारत इन संसाधनों के लिए लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। यदि पुरानी बैटरियों से ही इन धातुओं की पुनर्प्राप्ति संभव हो जाती है, तो देश की विदेशी निर्भरता कम होगी और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत बनेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम भारत की सर्कुलर इकोनॉमी को गति देगा, जहां कचरे को संसाधन में बदलने की अवधारणा पर काम किया जाता है।
आने वाले वर्षों में बढ़ेगी चुनौती
अनुमान है कि वर्ष 2031 तक दुनिया में हर साल करीब 1.1 करोड़ टन बैटरी कचरा उत्पन्न होगा। वहीं भारत में वर्ष 2035 तक यह आंकड़ा लगभग 20 लाख टन तक पहुंच सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक और औद्योगिक स्तर पर रीसाइक्लिंग की मजबूत व्यवस्था समय की बड़ी जरूरत बन चुकी है।
जमशेदपुर से निकला राष्ट्रीय समाधान
CSIR-NML के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधरी और उनकी वैज्ञानिक टीम द्वारा विकसित यह तकनीक अब प्रयोगशाला से निकलकर व्यावसायिक स्तर पर पहुंचने जा रही है। R2E Greentech के साथ हुई साझेदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल होता है तो भारत न केवल बैटरी कचरे की समस्या से निपट सकेगा, बल्कि उसे एक बड़े आर्थिक अवसर में भी बदल सकेगा।
कुल मिलाकर, जमशेदपुर की यह पहल केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के हरित भविष्य, संसाधन सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
