Jamshedpur School Violence Concern : जमशेदपुर में शिक्षा के मंदिरों से आ रही खबरें अब मन में शांति के बजाय सिहरन पैदा कर रही हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कलम और खेल का सामान होना चाहिए, वहां अब धारदार हथियार और हिंसा जगह ले रही है। शहर के शिक्षण संस्थानों की घटनाओं ने एक बार फिर समाज के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर हमारे नौनिहाल इतने हिंसक क्यों हो रहे हैं?
केस-1
सिदगोड़ा स्थित एक स्कूल में सातवीं कक्षा के दो छात्रों के बीच किसी बात को लेकर विवाद शुरू हुआ। यह विवाद इतना गहरा गया कि एक छात्र ने आपा खो दिया और बैग से चापड़ (हथियार) निकालकर दूसरे छात्र पर हमला कर दिया। स्कूल परिसर में चीख-पुकार मच गई। घायल छात्र को तुरंत उपचार के लिए ले जाया गया। सूचना मिलते ही सिदगोड़ा थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने हथियार को जब्त कर लिया है और मामले की जांच कर रही है। स्कूल प्रबंधन और अन्य अभिभावक इस बात से हैरान हैं कि एक 12-13 साल का बच्चा स्कूल में इतना खतरनाक हथियार लेकर कैसे पहुंचा।
हिंसा की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। कुछ समय पूर्व बिष्टुपुर थाना क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित स्कूल में भी ऐसी ही घटना सामने आई थी। वहां भी छात्रों के बीच आपसी रंजिश के चलते चापड़बाजी की नौबत आ गई थी। उस घटना ने शहर के स्कूलों में सुरक्षा जांच (Bags checking) की अनिवार्यता पर लंबी बहस छेड़ दी थी, लेकिन आज की घटना बताती है कि धरातल पर बदलाव नहीं हुआ है।
इसी तरह की एक वारदात कदमा थाना क्षेत्र के एक स्कूल में भी देखी गई थी, जहाँ मामूली बहस के बाद छात्रों के गुटों में मारपीट हुई और उसमें धारदार हथियारों का प्रदर्शन किया गया। इन सभी घटनाओं में एक समानता यह है कि मामूली विवादों का समाधान संवाद के बजाय शारीरिक हिंसा से करने की कोशिश की गई है।
बिहेवियरल ऑब्जर्वेशन लॉग : शिक्षकों को उन छात्रों की एक सूची तैयार करनी चाहिए जिनके व्यवहार में अचानक बदलाव (जैसे- अधिक गुस्सा, अकेलापन, या पढ़ाई में अरुचि) दिख रहा हो।
अनाम शिकायत/सुझाव बॉक्स : स्कूल में ‘SAY NO TO VIOLENCE’ बॉक्स लगाएं, जहाँ छात्र बिना नाम बताए किसी भी सहपाठी के डराने-धमकाने (Bullying) की शिकायत कर सकें।
चरण 2 : सक्रिय काउंसलिंग (Active Counseling)
नियमित ‘हार्ट-टू-हार्ट’ सत्र : सप्ताह में कम से कम एक पीरियड ‘हैप्पीनेस और शेयरिंग’ के लिए आरक्षित हो, जहाँ छात्र बिना किसी डर के अपनी समस्याएं साझा करें।
प्रोफेशनल एक्सपर्ट्स की मदद : महीने में कम से कम एक बार मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) द्वारा ग्रुप काउंसलिंग और मोटिवेशनल सत्र आयोजित किए जाएं।
चरण 3 : डिजिटल डिटॉक्स और मोरल लर्निंग
स्क्रीनिंग ऑफ कंटेंट : अभिभावकों के साथ मिलकर बच्चों के सोशल मीडिया और गेमिंग पैटर्न पर नजर रखना।
इम्पैथी बिल्डिंग : छात्रों को जेलों, सुधार गृहों या सामाजिक संस्थाओं के दौरों के माध्यम से हिंसा के दुष्परिणामों से परिचित कराना।
सघन सुरक्षा ऑडिट (Security Audit) : स्कूलों में समय-समय पर औचक बैग चेकिंग अभियान चलाना और परिसर के हर कोने में उच्च क्षमता वाली सीसीटीवी निगरानी सुनिश्चित करना। इसका प्राथमिक उद्देश्य स्कूल के भीतर किसी भी प्रकार के घातक हथियार या प्रतिबंधित सामग्री के प्रवेश को पूर्णतः रोकना है।
संवाद सेतु (Dialogue Bridge) : प्रत्येक शनिवार को ‘हैप्पीनेस क्लास’ का विशेष आयोजन करना और स्कूल में ‘अनाम शिकायत पेटी’ स्थापित करना। इससे छात्र बिना किसी पहचान के उजागर होने के डर से अपने मन के आक्रोश, बुलिंग (Bullying) की शिकायत और अपनी समस्याओं को खुलकर साझा कर सकेंगे।
डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) : साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के मानसिक दुष्प्रभावों पर नियमित तकनीकी कार्यशालाएं आयोजित करना। इसका लक्ष्य छात्रों को हिंसक वेब सीरीज, गेम्स और सोशल मीडिया के ‘फेक ग्लैमराइजेशन’ के प्रति जागरूक कर उनसे दूर रखना है।
अभिभावक सहभागिता (Parent Participation) : महीने में कम से कम एक बार अनिवार्य ‘पैरेंट-काउंसलिंग’ सत्र का आयोजन करना। इससे अभिभावकों और शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल बनेगा, जिससे बच्चे के घर और स्कूल के व्यवहार में आने वाले किसी भी संदिग्ध बदलाव को तुरंत पहचाना जा सके।
विशेषज्ञों की मानें, तो जमशेदपुर के स्कूल संचालकों के लिए अब यह अनिवार्य हो गया है कि वे केवल पढ़ाई पर ही नहीं, बल्कि छात्रों की काउंसलिंग और बैग की नियमित जांच पर भी ध्यान दें। पुलिस प्रशासन ने भी स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के तहत कार्रवाई की जाएगी, लेकिन केवल कानून से यह समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए घर और स्कूल, दोनों जगह नैतिक शिक्षा और प्रेम का माहौल बनाना होगा।