June 24, 2026

मोदी सरकार में संसद हुई तेज, लेकिन क्या कमजोर भी?

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नई दिल्ली: देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था संसद को लेकर एक नई रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विश्लेषण के अनुसार, पिछले एक दशक में संसद ने कम समय में अधिक कानून पारित किए हैं, लेकिन इस बढ़ी हुई “उत्पादकता” की कीमत संसदीय बहस, चर्चा और निगरानी तंत्र की कमजोरी के रूप में चुकानी पड़ी है। रिपोर्ट बताती है कि संसद का कामकाज कागज़ों पर अधिक प्रभावी दिखता है, लेकिन कानूनों पर गहन विचार-विमर्श और जवाबदेही की प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 से 2014 के बीच 15वीं लोकसभा का लगभग एक-तिहाई समय हंगामे और विरोध प्रदर्शनों की भेंट चढ़ गया था। वहीं 2014 के बाद संसद में व्यवधान कम हुए, लेकिन इसके साथ ही संसदीय समितियों को भेजे जाने वाले विधेयकों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई। 15वीं लोकसभा में जहां 71% विधेयक समितियों को भेजे गए थे, वहीं 17वीं लोकसभा में यह आंकड़ा घटकर मात्र 16% रह गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कानूनों की गुणवत्ता और विशेषज्ञ समीक्षा प्रभावित हुई है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 17वीं लोकसभा में एक-तिहाई से अधिक विधेयक एक घंटे से भी कम चर्चा के बाद पारित कर दिए गए। 2019 से 2023 के बीच लगभग 80% बजटीय प्रस्ताव बिना किसी बहस के मंजूर हुए। सांसदों की उपस्थिति अपेक्षाकृत अच्छी रही, लेकिन प्रश्नकाल का समय घटा और सूचीबद्ध प्रश्नों में से केवल 24% का ही उत्तर दिया गया। इसके अलावा रक्षा, लोक लेखा और अनुमान समिति जैसी महत्वपूर्ण समितियों की बैठकों में भी लगातार कमी दर्ज की गई।

विश्लेषण में यह निष्कर्ष सामने आया है कि संसद आज पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखती है, लेकिन उसकी विचार-विमर्श और निगरानी की भूमिका कमजोर हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, कार्यपालिका की शक्ति अधिक केंद्रीकृत हुई है और प्रधानमंत्री की सार्वजनिक संवाद शैली ने संसद-केंद्रित राजनीति की जगह ली है। इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही और सहमति निर्माण की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।