टेलीग्राम बना ‘नया डार्क वेब’? दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र का बड़ा दावा, आतंकवाद से लेकर पेपर लीक तक के गंभीर आरोप
नई दिल्ली: क्या करोड़ों भारतीयों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला टेलीग्राम अब सिर्फ एक मैसेजिंग ऐप नहीं, बल्कि अपराधियों का नया अड्डा बन चुका है? दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार को केंद्र सरकार ने ऐसा दावा किया जिसने डिजिटल दुनिया में नई बहस छेड़ दी है।
सरकार ने क्यों उठाए इतने बड़े सवाल?
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि टेलीग्राम की कुछ विशेषताएं अपराधियों के लिए बेहद सुविधाजनक साबित हो रही हैं। सरकार के अनुसार, प्लेटफॉर्म पर ऐसे बंद समूह और चैनल सक्रिय हैं जिनका इस्तेमाल साइबर ठगी, डेटा चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध लेन-देन के लिए किया जा रहा है।
सरकार का दावा है कि टेलीग्राम के जरिए लोगों की निजी जानकारी, बैंकिंग डिटेल्स और यहां तक कि लीक हुए डेटाबेस भी बेचे जा रहे हैं। जांच एजेंसियों के मुताबिक कई साइबर अपराधी टेलीग्राम चैनलों के माध्यम से अपने नेटवर्क का संचालन कर रहे हैं।
आतंकवाद और कट्टरपंथी प्रचार का भी आरोप
केंद्र ने कोर्ट को बताया कि कुछ चरमपंथी और कट्टरपंथी संगठन टेलीग्राम का इस्तेमाल प्रचार सामग्री फैलाने और युवाओं को प्रभावित करने के लिए कर रहे हैं। इसके अलावा बाल शोषण सामग्री, पायरेटेड फिल्मों और कॉपीराइट उल्लंघन से जुड़ी सामग्री के प्रसार को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई गईं।
सरकार के अनुसार, कई साइबर अपराधी टेलीग्राम का उपयोग मैलवेयर फैलाने और लोगों के मोबाइल तथा बैंक खातों तक पहुंच बनाने के लिए कर रहे हैं।
टेलीग्राम का पक्ष क्या है?
टेलीग्राम की ओर से कोर्ट में कहा गया कि करोड़ों लोग इस प्लेटफॉर्म का उपयोग पूरी तरह वैध और सामान्य उद्देश्यों के लिए करते हैं। कंपनी का तर्क है कि कुछ लोगों की गलत गतिविधियों के कारण पूरे प्लेटफॉर्म को निशाना बनाना उचित नहीं होगा।
टेलीग्राम ने यह भी कहा कि वह कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग कर रहा है और आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए लगातार कदम उठा रहा है।
हाईकोर्ट के सामने बड़ा सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने भी माना कि मामला बेहद संवेदनशील है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि कुछ लोग किसी प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग कर रहे हैं, तो क्या इसके लिए पूरे ऐप पर प्रतिबंध लगाना सही होगा?
यही वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले दिनों में दिल्ली हाईकोर्ट को तलाशना होगा। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर अपराध और सार्वजनिक हित की चिंताएं हैं, तो दूसरी तरफ करोड़ों वैध उपयोगकर्ताओं की डिजिटल स्वतंत्रता।
अब आगे क्या?
यह मामला सिर्फ टेलीग्राम तक सीमित नहीं है। अदालत का फैसला भविष्य में सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने वाला एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। अगर केंद्र के आरोप साबित होते हैं तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी और नियमों को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
फिलहाल देशभर की निगाहें दिल्ली हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि टेलीग्राम एक जरूरी संचार माध्यम है या फिर वास्तव में वह मंच बन चुका है जिसे सरकार “नया डार्क वेब” बता रही है।
