26 साल बाद फिर जागेगी तांबे की धरती! पूर्वी सिंहभूम में खुलने जा रहा खजाना, हजारों युवाओं के लिए रोजगार की उम्मीद
जमशेदपुर: कभी तांबा उत्पादन के लिए देशभर में पहचान रखने वाला पूर्वी सिंहभूम अब एक बार फिर अपनी खोई हुई चमक वापस पाने की ओर बढ़ रहा है। दो दशक से अधिक समय से बंद पड़े पाथरगोड़ा तांबा खदान और नए चापरी कॉपर ब्लॉक को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। जिंदल स्टील इन खदानों में खनन कार्य शुरू करने की तैयारी में जुट गया है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, तो यह परियोजना न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के तांबा उत्पादन क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है।
खनन विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों खदान क्षेत्रों में लगभग 10.4 करोड़ टन तांबा अयस्क (कॉपर ओर) का विशाल भंडार मौजूद है। इनमें चापरी ब्लॉक में करीब 6.4 करोड़ टन और पाथरगोड़ा में लगभग 4 करोड़ टन तांबा अयस्क होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भंडार आने वाले वर्षों में देश की तांबा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पाथरगोड़ा खदान का इतिहास भी काफी गौरवशाली रहा है। एक समय यह भूमिगत खदान हर वर्ष करीब दो लाख टन तांबा अयस्क का उत्पादन करती थी। लेकिन बढ़ती लागत और आर्थिक नुकसान के कारण वर्ष 2000 में यहां खनन कार्य बंद कर दिया गया था। तब से यह खदान लगभग 26 वर्षों से शांत पड़ी हुई है।
वर्तमान में इन खदानों का स्वामित्व हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) के पास है, जिसके पास वर्ष 2043 तक का खनन पट्टा है। प्रस्तावित योजना के तहत जिंदल स्टील माइन डेवलपर कम ऑपरेटर (MDO) मॉडल पर काम करेगा। यानी खदानों का स्वामित्व HCL के पास ही रहेगा, लेकिन खनन और उससे जुड़ा बुनियादी ढांचा विकसित करने की जिम्मेदारी जिंदल स्टील संभालेगा। कंपनी यहां कॉन्सेंट्रेटर प्लांट समेत कई आधुनिक सुविधाएं भी विकसित कर सकती है।
इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों को मिलने की उम्मीद है। खनन कार्य शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। परिवहन, मशीनरी, निर्माण, रखरखाव और अन्य सहायक उद्योगों को भी नई गति मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बड़ा बल मिलेगा और रोजगार की तलाश में बाहर जाने वाले युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर नए अवसर पैदा होंगे।
उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि यदि यह परियोजना सफलतापूर्वक शुरू होती है, तो पूर्वी सिंहभूम एक बार फिर देश के प्रमुख तांबा उत्पादन केंद्रों में शामिल हो सकता है। साथ ही भारत की आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू खनिज उत्पादन बढ़ाने में भी यह कदम महत्वपूर्ण साबित होगा।
करीब ढाई दशक से बंद पड़ी खदानों में फिर से मशीनों की आवाज गूंजने की संभावना ने पूरे क्षेत्र में नई उम्मीद जगा दी है। अब सबकी निगाहें सरकार की अंतिम मंजूरी पर टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला केवल खनन परियोजना का नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य और क्षेत्र के आर्थिक पुनर्जागरण से जुड़ा हुआ है।
