May 19, 2026

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने जताई नाराज़गी, बोले – पद भले आज न हो, लेकिन संवैधानिक जिम्मेदारियों का अनुभव मेरे साथ

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सर्च न्यूज: सच के साथ: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता Arjun Munda एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। रांची में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने झारखंड सरकार पर PESA (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज) नियमों को कमजोर करने का आरोप लगाया। अर्जुन मुंडा ने कहा कि 1996 का यह कानून आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा और पारंपरिक स्वशासन को मजबूत करने के लिए बनाया गया था, लेकिन राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए नए नियमों में इसकी मूल भावना को कमजोर कर दिया गया है। उनके अनुसार ग्राम सभा के अधिकार, परंपरागत कानून और आदिवासी स्वायत्तता से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को सीमित कर दिया गया है।

अर्जुन मुंडा ने इसे आदिवासी पहचान और अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए कहा कि यदि PESA कानून की मूल संरचना कमजोर होती है तो इसका असर आने वाले वर्षों में सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने लंबे इंतजार और अदालत के दबाव के बाद नियम तो लागू किए, लेकिन अंतिम ढांचा संविधान की भावना के अनुरूप नहीं बनाया गया। भाजपा नेताओं का कहना है कि सरकार गांव स्तर पर आदिवासी संस्थाओं को मजबूत करने के बजाय प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहती है।

राजनीतिक मोर्चे पर भी अर्जुन मुंडा लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। हाल के महीनों में उन्होंने नई दिल्ली में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की और झारखंड सहित कई राज्यों में आदिवासी समुदायों से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा एक बार फिर अर्जुन मुंडा जैसे अनुभवी आदिवासी नेताओं के जरिए झारखंड में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए आदिवासी इलाकों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अर्जुन मुंडा आज भी झारखंड की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा बने हुए हैं, क्योंकि उनका लंबा राजनीतिक अनुभव और आदिवासी मुद्दों से गहरा जुड़ाव उन्हें अलग पहचान देता है। उनके हालिया बयानों ने राज्य में आदिवासी अधिकार, स्थानीय स्वशासन और विकास नीतियों को लेकर बहस को और तेज कर दिया है। आने वाले समय में भूमि अधिकार, स्थानीय प्रशासन और आदिवासी पहचान जैसे मुद्दे झारखंड की राजनीति को और अधिक गर्मा सकते हैं।

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