झारखंड के चांडिल और दलमा अभयारण्य से सटे इलाकों में एक बार फिर जंगली हाथियों का आतंक लोगों के लिए डर और गुस्से की वजह बन गया है। लगातार हो रहे हाथी हमलों, फसलों की बर्बादी और ग्रामीणों की जान जाने की घटनाओं के बीच अब यह मुद्दा सिर्फ वन्यजीव संघर्ष नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बन चुका है।
इचागढ़ क्षेत्र में हाल ही में हुए हाथी हमले के बाद स्थानीय लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया। ग्रामीणों का कहना है कि हर साल हाथियों का झुंड गांवों में घुस आता है, घर तोड़ता है, फसलें बर्बाद करता है और कई बार लोगों की जान तक चली जाती है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकला।
इसी बीच इचागढ़ विधायक के बयान ने पूरे मामले को और गरमा दिया। बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में विवाद शुरू हो गया है। विपक्ष ने सरकार पर जंगल और ग्रामीणों दोनों की सुरक्षा में विफल रहने का आरोप लगाया, जबकि स्थानीय लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक गांव वाले रातभर जागकर हाथियों से अपनी जान बचाते रहेंगे।
दलमा क्षेत्र में हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष कोई नई बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से चांडिल, इचागढ़ और आसपास के इलाकों में हाथियों के झुंड लगातार गांवों की तरफ बढ़ रहे हैं। वन विभाग के अनुसार हाथियों के पारंपरिक रास्तों में बदलाव और जंगलों के घटते दायरे के कारण यह समस्या और गंभीर होती जा रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की टीम अक्सर देर से पहुंचती है और कई बार हाथियों को भगाने की व्यवस्था भी नाकाफी साबित होती है। लोग अब स्थायी समाधान, बेहतर मुआवजा व्यवस्था और संवेदनशील इलाकों को “रेड जोन” घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल दलमा का यह मुद्दा सिर्फ जंगल तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल अब सीधा सरकार, प्रशासन और वन्यजीव प्रबंधन की नीतियों पर उठ रहा है — आखिर इंसान और जंगल के बीच संतुलन कैसे बने, जब दोनों की जंग हर साल और खतरनाक होती जा रही हो।