June 21, 2026

ग्रेट निकोबार पर फिर घमासान, क्या छिपा रही सरकार?

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ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के उस जवाब को “निराशाजनक और असंतोषजनक” बताया है, जिसमें सरकार ने परियोजना के पर्यावरणीय और रणनीतिक पहलुओं का बचाव किया था। जयराम रमेश का आरोप है कि सरकार इस महत्वाकांक्षी परियोजना से जुड़ी कई महत्वपूर्ण रिपोर्टों और अध्ययनों को सार्वजनिक नहीं कर रही है, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

करीब 81,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना में ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और ग्रीनफील्ड टाउनशिप विकसित करने की योजना है। सरकार का कहना है कि यह परियोजना देश की सामरिक और आर्थिक जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसी आधार पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भी इस वर्ष परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति देते हुए पर्यावरण मंजूरी में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।

हालांकि, परियोजना के विरोधियों का कहना है कि इसके पर्यावरणीय प्रभाव बेहद गंभीर हो सकते हैं। अनुमान है कि इसके लिए लगभग 10 लाख पेड़ों की कटाई करनी पड़ सकती है और यह क्षेत्र दुर्लभ लेदरबैक समुद्री कछुओं के प्रजनन स्थल के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा, द्वीप पर रहने वाले शॉम्पेन जनजातीय समुदाय के अधिकारों और अस्तित्व को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही हैं। जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्टें अधूरी हैं और कई संरक्षण योजनाओं की जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

विवाद तब और गहरा गया जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि 2024 में वित्त मंत्रालय की एक समिति ने प्रस्तावित बंदरगाह में स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्यों की कमी की ओर इशारा किया था। ऐसे में अब सवाल केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि परियोजना की पारदर्शिता और वास्तविक जरूरत का भी बन गया है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर छिड़ी यह बहस आने वाले दिनों में देश के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर एक बड़ी राष्ट्रीय चर्चा का रूप ले सकती है।

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