May 20, 2026

“न्याय में देरी मतलब ज़िंदगी बर्बाद”: डॉ. अजय कुमार ने न्यायिक व्यवस्था पर उठाए सवाल, केंद्र पर साधा निशाना

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कांग्रेस नेता डॉ. अजय कुमार के एक तीखे बयान के बाद देश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर नई बहस छिड़ गई है। उन्होंने अदालतों में लंबित मामलों, जजों की भारी कमी और खाली पदों को भारत में न्याय मिलने में हो रही देरी का सबसे बड़ा कारण बताया।

सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने बयान में डॉ. अजय कुमार ने कहा कि देश की अदालतों में जजों की भारी कमी के कारण लाखों मामले वर्षों तक लंबित पड़े रहते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि इसी वजह से कई अंडरट्रायल कैदी बिना फैसला आए वर्षों तक जेल में रहने को मजबूर हो जाते हैं, जो बेहद दुखद और चिंताजनक स्थिति है।

उन्होंने खास तौर पर उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां एक जज के ऊपर औसतन लगभग 4300 मामलों का बोझ है। डॉ. कुमार ने इसे न्याय व्यवस्था पर “असहनीय दबाव” बताते हुए कहा कि अगर समय रहते सुधार नहीं किए गए तो आम लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा कमजोर हो सकता है।

अपने बयान में उन्होंने मोदी सरकार पर भी निशाना साधा। डॉ. कुमार का आरोप था कि पिछले कई वर्षों से न्यायपालिका में खाली पड़े पदों को भरने और अदालतों का बोझ कम करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। उनके अनुसार, “न्याय में देरी केवल कानूनी प्रक्रिया की समस्या नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी और भविष्य का सवाल है।”

भारत में अदालतों में लंबित मामलों का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। जिला अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक करोड़ों मामले अभी भी लंबित हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की कमी, धीमी प्रक्रियाएं और बढ़ते मुकदमे इस समस्या को लगातार गंभीर बना रहे हैं।

हालांकि सरकार की ओर से डिजिटल सुधार, ई-कोर्ट सिस्टम और न्यायिक प्रक्रियाओं को तेज करने के लिए कई पहलें की जा रही हैं। लेकिन विपक्ष का कहना है कि केवल तकनीकी बदलाव काफी नहीं हैं, जब तक जजों की नियुक्तियों और न्यायिक ढांचे को मजबूत करने पर तेज़ी से काम नहीं किया जाता।

डॉ. अजय कुमार के बयान ने अब इस मुद्दे को राजनीतिक रंग भी दे दिया है। एक तरफ विपक्ष इसे आम जनता के न्याय के अधिकार से जोड़कर सरकार को घेर रहा है, वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि न्यायिक नियुक्तियां कई संवैधानिक प्रक्रियाओं से जुड़ी होती हैं और इसकी जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार पर नहीं डाली जा सकती।

फिलहाल इतना तय है कि अदालतों में बढ़ते लंबित मामले और न्याय मिलने में हो रही देरी देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुके हैं — और यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है।