‘ऑपरेशन टाइगर’ से उद्धव सेना में भूचाल! क्या 6 सांसद थामेंगे शिंदे का हाथ? महाराष्ट्र की राजनीति में फिर बड़ा धमाका
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े सियासी उलटफेर की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। 2022 में शिवसेना में हुई ऐतिहासिक टूट के बाद अब एक नया राजनीतिक अध्याय लिखे जाने की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के छह सांसद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के खेमे के संपर्क में हैं और जल्द ही बड़ा फैसला ले सकते हैं।
कौन हैं चर्चा के केंद्र में?
जिन सांसदों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं उनमें संजय दिना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टीकर, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय जाधव शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि अभी तक किसी भी सांसद ने सार्वजनिक रूप से अपने रुख का खुलासा नहीं किया है, लेकिन उनकी राजनीतिक गतिविधियों ने अटकलों को और हवा दे दी है।
दिल्ली की बैठकों ने बढ़ाई हलचल
सूत्रों का दावा है कि दिल्ली में हुई कुछ महत्वपूर्ण बैठकों के बाद यह राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई। माना जा रहा है कि कुछ सांसदों ने शिंदे गुट के नेताओं के साथ रणनीतिक बातचीत की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समूह अलग होकर नया संसदीय गुट बनाता है, तो उसके बाद शिंदे शिवसेना में विलय का रास्ता भी खुल सकता है।
संजय राउत का बड़ा आरोप
इस बीच शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के कुछ सांसदों को पक्ष बदलने के लिए भारी रकम का लालच दिया जा रहा है। राउत ने चुनौती देते हुए कहा कि यदि कोई नेता पार्टी छोड़ना चाहता है तो पहले इस्तीफा देकर जनता के बीच जाए और नया जनादेश हासिल करे।
उनके बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। वहीं दूसरी ओर शिंदे गुट की तरफ से इन आरोपों पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखी ‘गैरहाजिरी’, बढ़े सवाल
दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिवसेना (UBT) के केवल तीन सांसदों की मौजूदगी ने भी कई सवाल खड़े कर दिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कई सांसदों की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर चल रही हलचल को लेकर चर्चाओं को और मजबूत किया है।
क्या फिर बदलेगा महाराष्ट्र का राजनीतिक नक्शा?
अगर छह सांसद वास्तव में शिंदे गुट का समर्थन करते हैं, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक दल की अंदरूनी घटना नहीं होगी, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता और विपक्ष दोनों के समीकरणों पर असर डाल सकती है। 2022 की बगावत के बाद यह शिवसेना परिवार के लिए दूसरा बड़ा झटका माना जा सकता है।
अब सभी की निगाहें 19 जून के शिवसेना स्थापना दिवस कार्यक्रम पर टिकी हैं। क्या “ऑपरेशन टाइगर” वास्तव में दहाड़ेगा, या फिर यह केवल सियासी अटकल साबित होगा? इसका जवाब आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि महाराष्ट्र की सियासत में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक विस्फोट की आहट सुनाई दे रही है।
