July 1, 2026

राम मंदिर केस में वकीलों के फैसले पर बड़ा संवैधानिक सवाल

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अयोध्या राम मंदिर दान गबन मामले में आरोपियों का पक्ष न लेने के अयोध्या बार एसोसिएशन के फैसले ने देशभर में नई कानूनी बहस छेड़ दी है। बार एसोसिएशन ने घोषणा की है कि कोई भी वकील आरोपियों की पैरवी नहीं करेगा और यदि कोई ऐसा करता है तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। इस फैसले के बाद न्याय व्यवस्था, संवैधानिक अधिकारों और वकीलों की पेशेवर जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि किसी भी आरोपी को कानूनी सहायता से वंचित करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। उनका कहना है कि अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार देता है। जब तक अदालत दोष सिद्ध नहीं करती, तब तक हर आरोपी निर्दोष माना जाता है और उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कोई वकील व्यक्तिगत नैतिक आधार पर किसी मुकदमे को लेने से इनकार कर सकता है, लेकिन कोई बार एसोसिएशन सामूहिक रूप से किसी आरोपी के बचाव पर रोक नहीं लगा सकती। उनका तर्क है कि यदि सभी वकील एक साथ इंकार कर दें, तो अदालत को कानूनी सहायता उपलब्ध करानी पड़ेगी। ऐसी स्थिति में निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए मुकदमे को दूसरे जिले या राज्य में स्थानांतरित करने की नौबत भी आ सकती है।

इस विवाद ने एक बार फिर भारतीय न्याय व्यवस्था के उस मूल सिद्धांत को चर्चा में ला दिया है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि 26/11 मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब और निर्भया कांड के दोषियों को भी कानूनी प्रतिनिधित्व मिला था। उनका कहना है कि किसी आरोपी का बचाव करना उसके अपराध का समर्थन नहीं, बल्कि कानून के शासन और निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया की रक्षा करना है।