June 22, 2026

AI का बढ़ता जाल, लेकिन किस कीमत पर?

214026-izmmtalonu-1781716215

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की तेज़ी से बढ़ती मांग के बीच दुनिया भर में डेटा सेंटरों का विस्तार हो रहा है। ये विशाल केंद्र इंटरनेट, एआई चैटबॉट्स और ऑनलाइन सेवाओं की रीढ़ माने जाते हैं, लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इनके पीछे छिपी पर्यावरणीय और सामाजिक लागत को उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दुनिया को शक्ति देने वाले ये केंद्र स्थानीय समुदायों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं। अमेरिका में ही 2028 तक देश की कुल बिजली खपत का लगभग 12% हिस्सा डेटा सेंटरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने का अनुमान है। इन केंद्रों को चलाने के लिए जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन बढ़ता है, जिससे वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ता है। वहीं सर्वरों को ठंडा रखने के लिए अरबों लीटर पानी की जरूरत पड़ती है, जिससे स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।

सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, डेटा सेंटरों के आसपास रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो रही है। 24 घंटे चलने वाले कूलिंग सिस्टम और जनरेटर लगातार शोर पैदा करते हैं, जिससे लोगों की नींद, एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा ग्रामीण और हरित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण से प्राकृतिक वातावरण और कृषि भूमि पर भी खतरा बढ़ रहा है। कई स्थानों पर स्थानीय लोगों ने बढ़ते ट्रैफिक, डीजल प्रदूषण और निर्माण गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार जरूरी है, लेकिन इसके साथ टिकाऊ विकास को प्राथमिकता देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग, पुनर्चक्रित पानी की व्यवस्था, बेहतर शोर नियंत्रण और डेटा सेंटरों से जुड़े खर्चों का उचित वितरण जैसे कदम इन समस्याओं को कम कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या दुनिया तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सही रास्ता चुन पाएगी, या फिर डिजिटल क्रांति की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ेगी?