June 22, 2026

कश्मीर का खोया स्वाद, पुणे में फिर हुआ ज़िंदा

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पुणे के एक रेस्तरां ने उस कश्मीरी पाक विरासत को फिर से लोगों के सामने लाने का बीड़ा उठाया है, जो वर्षों से घरों की चारदीवारी तक सीमित थी। कश्मीरी व्यंजनों की बात आते ही अधिकांश लोगों के मन में वाज़वान का नाम आता है, लेकिन कश्मीरी पंडित समुदाय का पारंपरिक भोजन भी उतना ही समृद्ध और विशिष्ट है। इसी विरासत को संरक्षित करने के लिए ‘मातामाल’ नामक रेस्तरां लोगों को कश्मीरी पंडित व्यंजनों से परिचित करा रहा है।

कश्मीरी पंडित भोजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें प्याज, लहसुन और टमाटर का उपयोग नहीं किया जाता। इसके बजाय हींग, सौंठ, सौंफ पाउडर और दही जैसे पारंपरिक तत्वों से गहरे और अनोखे स्वाद तैयार किए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर घाटी से पलायन के बाद यह पाक परंपरा सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब हो गई थी और केवल परिवारों के भीतर ही संरक्षित रह गई।

मातामाल की शुरुआत 2015 में कश्मीरी पंडित दंपति सुरेंद्र और नलिनी साधु ने की थी। बाद में उन्होंने पुणे के वाकड़ इलाके में एक स्वतंत्र आउटलेट शुरू किया, जहां ग्राहकों को कश्मीरी पंडित और वाज़वान दोनों प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं। रेस्तरां प्रबंधन का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल भोजन परोसना नहीं, बल्कि कश्मीर की संस्कृति, परंपराओं और असली स्वाद को लोगों तक पहुंचाना है।

दिलचस्प बात यह है कि रेस्तरां के अधिकांश ग्राहक कश्मीरी नहीं हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल और दक्षिण भारत के लोग भी इस अनोखे स्वाद को आजमाने के लिए यहां पहुंच रहे हैं। पारंपरिक थाली, कहवा, विशेष ब्रेड और कश्मीरी मिठाइयों के जरिए यह पहल न केवल एक दुर्लभ पाक विरासत को बचाने का काम कर रही है, बल्कि नई पीढ़ी को कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ रही है।