Jamshedpur Kudmali Divas Par Anokha Sandesh : विवाह समारोह बना सांस्कृतिक पहचान का संदेशवाहक
कुड़माली भाषा के पुरोधा लक्ष्मीकांत मुतरुआर की जयंती पर अनूठी पहल
जमशेदपुर : झारखंड की लोक-सांस्कृतिक विरासत में कुड़माली भाषा को पहचान दिलानेवाले लक्ष्मीकांत मुतरुआर की जयंती (22 अप्रैल) इस वर्ष एक अनोखे अंदाज में मनाई गई. कुड़मी समाज के अगुआ दिलीप कडुआर ने अपने पुत्र राजकिशोर के विवाह को ‘कुड़माली दिवस’ से जोडक़र इसे सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक संदेश का माध्यम बना दिया. ज्ञात हो कि लक्ष्मीकांत मुतरुआर ने अपने जीवनकाल में कुड़माली भाषा के प्रचार-प्रसार, साहित्यिक विकास और सामाजिक सम्मान में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है. उनके निधन के बाद कुड़मी समाज द्वारा हर वर्ष 22 अप्रैल को ‘कुड़माली दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.
इसी कड़ी में आयोजित इस विवाह में सबसे खास बात रही कि विवाह बिना तिलक-दहेज के संपन्न हुआ, जिसने समाज में एक सकारात्मक संदेश दिया. साथ ही पूरा विवाह कुड़माली परंपरागत नेग-नीति के अनुसार संपन्न किया गया. यह बारात डिमना बालीगुमा के सुखना बस्ती से निकलकर सरायकेला-खरसावां जिले के तिरुलडीह क्षेत्र स्थित बाहमनडीह गांव पहुंची. विवाह यात्रा के दौरान शामिल सभी गाडिय़ों को विशेष रूप से सजाया गया था. हर वाहन पर श्री मुतरुआर की तस्वीर लगाई गई थी और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े संदेश लिखे गए थे. इस अनूठे आयोजन ने क्षेत्र में व्यापक चर्चा बटोरी और समाज के सामने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया. एक ओर जहां विवाह की खुशियां थीं, वहीं दूसरी ओर अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान के प्रति गहरा सम्मान भी देखने को मिला.
