पाकिस्तान पर मोदी नीति पर सवाल!
नई दिल्ली: क्या पाकिस्तान को नजरअंदाज करना भारत की रणनीतिक मजबूरी है या फिर यह एक ऐसी नीति बन चुकी है जो भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है? यही सवाल अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनता दिख रहा है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार का रुख बेहद सख्त है। पुलवामा, बालाकोट, पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने साफ संदेश दिया है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। दोनों देशों के बीच व्यापार, संवाद और कई अन्य संपर्क लगभग ठप हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान विकल्प जरूर दिख सकता है, लेकिन एक परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी के मामले में यह रणनीति हमेशा कारगर नहीं होती। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जिन्होंने कारगिल युद्ध और आतंकी हमलों के बावजूद बातचीत के रास्ते खुले रखने की कोशिश की थी।
विश्लेषकों का कहना है कि केवल सैन्य दबाव या कूटनीतिक अलगाव किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकता। पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और बढ़ते कट्टरपंथ के बीच भारत के सामने चुनौती यह है कि वह सुरक्षा और कूटनीति के बीच संतुलन कैसे बनाए।
फिलहाल केंद्र सरकार के रुख में किसी बदलाव के संकेत नहीं हैं। लेकिन होसबाले के बयान ने यह जरूर दिखा दिया है कि पाकिस्तान को लेकर देश के भीतर रणनीति पर चर्चा अभी खत्म नहीं हुई है। सवाल यही है कि क्या भविष्य में भारत सिर्फ दबाव की नीति पर चलेगा या फिर किसी नए संवाद की संभावना भी तलाशेगा?
भारत-पाकिस्तान रिश्तों की कहानी में यह बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है, क्योंकि दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी अपने उच्च स्तर पर बना हुआ है।
