June 14, 2026

ग्रेट निकोबार में ₹13,000 करोड़ का मेगा एयरपोर्ट! लेकिन क्यों उठ रहे सवाल? जयराम रमेश ने सरकार से कहा—’फैसले पर फिर सोचिए’

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रणनीतिक मजबूती बनाम पर्यावरणीय चिंता, अंडमान-निकोबार में शुरू हुई नई बहस

हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। केंद्र सरकार जहां यहां ₹13,000 करोड़ की लागत से एक विशाल दोहरे उपयोग (सिविल और सैन्य) वाले एयरपोर्ट के निर्माण की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस परियोजना पर गंभीर सवाल उठाते हुए सरकार से फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को लिखे पत्र में कहा है कि ग्रेट निकोबार के गैलाथिया बे में नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने के बजाय कैंपबेल बे स्थित INS Baaz के रनवे का विस्तार अधिक व्यावहारिक और कम नुकसानदायक विकल्प हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि ग्रेट निकोबार में एक अत्याधुनिक एयरपोर्ट और रनवे विकसित किया जाएगा, जिस पर लगभग ₹13,000 करोड़ खर्च होंगे। यह परियोजना नागरिक उड्डयन मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सहयोग से पूरी की जाएगी।

सरकार का मानना है कि यह एयरपोर्ट भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाएगा और नौसेना की त्वरित तैनाती तथा निगरानी क्षमता को नई ताकत देगा।

ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक ‘सिक्स डिग्री चैनल’ के बेहद करीब स्थित है, जहां से हर साल हजारों अंतरराष्ट्रीय जहाज गुजरते हैं।

जयराम रमेश की आपत्ति क्या है?

कांग्रेस नेता का तर्क है कि नया एयरपोर्ट बनाने से बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव पड़ सकते हैं। उनका कहना है कि पहले से मौजूद INS Baaz का विस्तार करके भी वही रणनीतिक उद्देश्य हासिल किए जा सकते हैं, जिनके लिए नया एयरपोर्ट प्रस्तावित है।

उन्होंने दावा किया कि नौसेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी पहले INS Baaz के पूर्ण विस्तार की सिफारिश की थी। ऐसे में नए एयरपोर्ट के बजाय मौजूदा सैन्य ढांचे को मजबूत करना बेहतर विकल्प हो सकता है।

रणनीतिक महत्व क्यों है इतना बड़ा?

विशेषज्ञों के अनुसार, हिंद महासागर आने वाले वर्षों में वैश्विक भू-राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है। चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की सुरक्षा को देखते हुए भारत अंडमान-निकोबार क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहता है।

ग्रेट निकोबार में आधुनिक एयरबेस बनने से भारतीय नौसेना और वायुसेना को लंबी दूरी की निगरानी, रसद सहायता और आपातकालीन सैन्य प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण बढ़त मिल सकती है।

विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती

यह विवाद केवल एक एयरपोर्ट का नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का भी है। एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की जरूरतें हैं, तो दूसरी ओर ग्रेट निकोबार की अनूठी जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर चिंताएं भी मौजूद हैं।

अब सबकी नजर केंद्र सरकार के अगले कदम पर है। क्या सरकार मौजूदा योजना पर आगे बढ़ेगी या फिर INS Baaz विस्तार के विकल्प पर दोबारा विचार करेगी? आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल इतना तय है कि ग्रेट निकोबार सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

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